46. ज़िन्दगी तो है मुझी से
ज़िन्दगी तो है मुझी से
मैं नहीं हूँ ज़िन्दगी से
ठोस कुछ कर ले यहाँ तू
कुछ न होगा सनसनी से
पेट ये भरता नहीं है
इश्क़ से और शायरी से
मन मेरा डरता रहा है
मौसमों की वापसी से
तू निकल जा आज "माँझी"
मौज कि पतली गली से
-देवेन्द्र माँझी
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