42. गुज़रे वक़्त की मिल जाती हैं, हाँ, सौगातें पत्थर पर
गुज़रे वक़्त की मिल जाती हैं, हाँ, सौगातें पत्थर पर
ठोस ही मिलतीं जो भी मिलतीं लिक्खी बातें पत्थर पर
क्या कोई जलसा होना है पागल और दीवानों का
आज लगाते देखे हैं कुछ लोग कनातें पत्थर पर
बे-पर उड़ने वालों को सच का एहसास कराते हैं
ख़्वाबों की दम तोड़ चलीं अक्सर बारातें पत्थर पर
कोई उसे हीरा कहता है, मोती कोई समझता है
सतरंजी दुनिया की होतीं शै और मातें पत्थर पर
मख़मल और डल्लप के गद्दे तुमको यार मुबारक़ हों
अपनी तो कट ही जाती है सोकर रातें पत्थर पर
एक नदी ने जबसे उसकी कश्ती को भरमाया है
बैठा "माँझी" करता है ख़ुदसे ही बातें पत्थर पर
-देवेन्द्र माँझी
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