48. शर्म-हया ग़ैरत मे तुझसे अच्छा हूँ
शर्म-हया ग़ैरत मे तुझसे अच्छा हूँ
मैं तो इक साया हूँ बिलकुल नंगा हूँ
क्यों सबकी गर्दन पर मुझको टाँग रहे
मुझसे तो पूछो मैं किसका चेहरा हूँ
शाम ढले कब, कब आती है भर नई
मैं क्या जानू उलझन में मैं उलझा हूँ
सर के बल जो आज मुसाफ़िर चलते हैं
पूछ लो उनसे उनका ही मैं रस्ता हू
दरिया मुझसे बदज़न बेशक लाख रहे
लहरों का तो "माँझी" मैं ही चर्चा हूँ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. बदज़न=नाराज .
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