27. ज़माने की ज़बाँ का जब मैं चर्चा हो-सा जाता हूँ
ज़माने की ज़बाँ का जब मैं चर्चा हो-सा जाता हूँ
किसी को क्या पता मैं कितना तन्हा हो-सा जाता हूँ
बड़प्पन के सभी किरदार इतने बौने क्योंकर हैं
इसी उलझें में ही उलझा मैं बच्चा हो-सा जाता हूँ
उभर आती है भूले-से कभी मुस्कान जो मेरी
चलो उनकी निगाहों में तो अच्छा हो-सा जाता हूँ
मैं अँधियारा कभी मरता नहीं, यूँ ख़ुश न हो दुनिया
मैं सूरज से किरण लेकर सुनहरा हो-सा जाता हूँ
समन्दर की तरह खारा बना रहने से क्या "माँझी"
सभी की प्यास बुझ जाए मैं दरिया हो-सा जाता हूँ
-देवेन्द्र माँझी
09810793186
No comments:
Post a Comment