64. तन्हाई के कमरे में जो आज सजाकर रक्खी है
तन्हाई के कमरे में जो आज सजाकर रक्खी है
दिखलाओ तस्वीर तुम्हारे कैसे पागलपन की है
कल-तक जो ऊँची उड़ती थी पंख सुनहरे-से लेकर
आज वही ख़्वाबों की चिड़िया बैठ अकेले सिसकी है
रामायण और गीता के उपदेशों में उलझा है वो
कर्म करे या क़िस्मत देखे ये भी एक पहेली है
राह नई के चक्कर में गुम हो जाने का ख़तरा है
तू भी वो ही राह पकड़ ले दुनिया जिस पर चलती है
तूफ़ानों में दम कितना है "माँझी" को जो उलझा लें
आज लहर की साज़िश से ही नाव हमारी अटकी है
देवेन्द्र माँझी
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