73. आज तस्वीर कोई भी बनाये, आये
आज तस्वीर कोई भी बनाये, आये
अपने हाथों का हुनर हमको दिखाए, आये
ताक में उनकी जला लेता हूँ लो मैं भी अब
तुम ये आँधी से कहो दीप बुझाए, आये
इस अमावस में यही एक कमी खलती है
है अगर चाँद-बदन रात सजाये, आये
हम गए वक़्त के पत्थर हैं पड़े राहों में
किससे उम्मीद हमें, कौन उठाये, आये
चिपचिपा फिर न बदन उसका रहेगा "माँझी"
मुझसे बेक़ैफ समन्दर में नहाये, आये
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. ताक में=प्रतीक्षा में, 2. अमावस= अमावस की रात, काली रात, 3. चाँद-बदन=चाँद-जैसा बदन, प्रेयसी 4. बेक़ैफ=आनद-रहित।
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