80. चुप्पी की जब साज़िश समझा अपने मन की हलचल को
चुप्पी की जब साज़िश समझा अपने मन की हलचल को
खोल दिया तब झटपट मैंने निज होंठों की साँकल को
मेरे वध के आदेशों पर ख़ुशियाँ लोग मनाते हैं
क़ातिल ने क्या सजा लिया है देखो अपने मक़तल को
लानत है उन बेटों पर जो बेशर्मी से देख रहे
साज़िश के पंजों में फटता अपनी माँ के आँचल को
पीपल को क्या भाग्य मिला है पुजता तो है रोज़ मगर
दूर सभी रखते हैं फिर भी अपने घर से पीपल को
"माँझी" को तुम मत छेड़ो एकाग्र हुआ बैठा है वो
बाँध रहा है आज क़लम से आते-जाते हर पल को
-देवेन्द्र माँझी
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