292. पीछा इन सोचों के लश्कर से छुड़ाता कैसे
पीछा इन सोचों के लश्कर से छुड़ाता कैसे
शहर तन्हाई में ख्वाबों का बसाता कैसे
लाख चाहा था उजालों से रहूँ दूर मगर
धूप दहलीज़ पर थी उसको भगाता कैसे
सबने पहचान लिया आज मेरे क़ातिल को
ख़ूं-रँगे हाथ थे वो शख़्स छुपाता कैसे
आज जंगल में कहीं आग भड़क उट्ठी है
गर्म पत्तों को ये झोंका यहाँ लाता कैसे
इतना कोहरा था कि साहिल भी दिखाई न दिया
'माँझी' इस नाव को दरिया में घुमाता कैसे
-देवेन्द्र माँझी
(मजबूरियाँ मेरी' से)
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