288. सुनसान जंगलों में बुलाता मैं किस तरह
सुनसान जंगलों में बुलाता मैं किस तरह
जब रूठ ही गए तो मनाता मैं किस तरह
यादों की रौशनी तो उसी से मिली मुझे
फूँकों से उस दीये को बुझाता मैं किस तरह
तेरी अमानतें तो हैं दिल में छुपी हुई
ज़ख्मों को आईने में दिखाता मैं किस तरह
सब क़ाफ़िलों के नक़्शे-कफ़े-पा उदास थे
मटियाले रास्तों को सजाता मैं किस तरह
'माँझी' अकेली नाव को साहिल पे छोड़कर
सोई हुई नदी को जगाता मैं किस तरह
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. नक़्शे-कफ़े-पा=पाँवों के निशान।
(मजबूरियाँ मेरी' से)
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