Tuesday, January 19, 2016

293. वो जो कल मुस्कुराया था 


वो जो कल मुस्कुराया था
मैं नहीं था वो मेरा साया था

शाख से झाड़ ले गया पत्ते
कैसा झौंका हवा का आया था

आइनों में उदास चेहरों को
किसने फिर आईना दिखाया था

कैसे सुनता मैं उसकी तक़रीरें
अपने होंठों में बुदबुदाया था

काम क्या कर दिया बता 'माँझी'
लब पे लहरों के नाम आया था
                         -देवेन्द्र माँझी
(मजबूरियाँ मेरी' से)

No comments:

Post a Comment