Friday, January 8, 2016

286. पल में बदलें इतने रंग 


पल में बदलें इतने रंग
देख के उनको सब हैं दंग

पूर्ण स्वयं को कहते हैं
अंग हुए हैं जिनके भंग

धूप की शै पर बढ़ते हैं
साये हैं जो मेरे संग

मुँह में उँगली वक़्त रखे
देखके मुझसे मेरी जंग

इस-उसकी क्यों बात करें
सबके अपने-अपने ढंग

'माँझी' ही जीतेगा जंग,
तूफ़ाँ करले कितना तंग
             -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)
 

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