297. भीड़ तो अच्छी-ख़ासी थी
भीड़ तो अच्छी-ख़ासी थी
फिर भी ख़ूब उदासी थी
शोर हुआ तो याद गई
तन्हाई की वासी थी
वक़्त की सीता हर ही ली
प्रीत मेरी संन्यासी थी
मेरे हिस्से आई जो
ख़ुशबू वो भी बासी थी
जान तड़पकर दी 'माँझी'
मछली कितनी प्यासी थी
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