Thursday, February 18, 2016

300. कुछ नहीं रक्खा है यारो नव-पुरातन साल में 


कुछ नहीं रक्खा है यारो नव-पुरातन साल में
ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी आपको हर हाल में

वो भला विश्वास का अमृत चखेगा किस तरह
ढूँढ़ता है खाल तक जो शख़्स अपने बाल में

हैं नहीं गन्ने कि इनसे आपको मीठा मिले
बस! खटाई ही मिलेगी इमलियों की छाल में

चीज़ कोई ख़ास ही है, चाल बतलाती है ये
क्या छिपाकर लाये हैं देखें तो वो रूमाल में

इस तरह नीची निगाहों से समर्पण कर दिया
फँस गई हो जैसे मछली आज 'माँझी' जाल में

 

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