10. जब इमारत की तरह ये ढह गया मेरा बदन
जब इमारत की तरह ये ढह गया मेरा बदन
कुछ न कहकर भी बहुत-कुछ कह गया मेरा बदन
हाँ, शराफ़त की हदों में रह गया मेरा बदन
तब ही तो ये ज़ुल्म तेरे सह गया मेरा बदन
यह गया मेरा बदन और वह गया मेरा बदन
ख़ुद मुसाफ़िर, ख़ुद सफ़र बन रह गया मेरा बदन
चाँद-सी वो ख़ूबसूरत शै मिली जब राह में
इक गहन-सा लग गया तब गह गया मेरा बदन
रूह ने परवाज़ की जब छोड़कर "माँझी" इसे
आग की इक धार में तब बह गया मेरा बदन
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. गहन=ग्रहण, 2. रूह=आत्मा, 3. परवाज़=उड़ान.
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