16. साँस लेने, छोड़ने के फ़ल्सफ़े पैदा हुए
साँस लेने, छोड़ने के फ़ल्सफ़े पैदा हुए
जब हुआ मैं तब ज़मीं पार हादसे पैदा हुए
एक सूनापन रहा काफ़ी समय आकाश में
लोग कहते हैं परिन्दे परकटे पैदा हुए
कोई सूरज से कहे हमसे ठिठौली ना करे
क्या डरेंगे धूप से, जो आग से पैदा हुए
जब चला ज़िद ठानकर मैं, चौंक उट्ठे थे सभी
एक मंज़िल के लिए सौ रास्ते पैदा हुए
छू लिया सागर की जब नब्ज़ों को "माँझी" ने यहाँ
कश्तियों में भी हज़ारों ज़लज़ले पैदा हुए
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment