14. तौबा मेरी तौबा सचमुच ऐसी दुनियादारी से
तौबा मेरी तौबा सचमुच ऐसी दुनियादारी से
मैं तो अब उकताया हूँ हर-पल की मारामारी से
धर्म, सच, ईमानो-ग़ैरत के जो बख़्शे थे पुरखों ने
चोरी हो गए सारे गहने दिल की इस अलमारी से
हाथ पसारे रोज़ ये जीवन भिक्षा माँगे साँसों की
मरना ज़्यादा अच्छा है इस बे-ग़ैरत लाचारी से
ख़ामोशी से कुछ ना होगा यूँ ही पिसते जाओगे
अपने हक़ की ख़ातिर खेलो यारो तेग़ दुधारी से
छोटी कश्ती है "माँझी" की सब इसमें ना आओगे
दरिया पार कराऊँगा मैं तुमको बारी-बारी से
-देवेन्द्र माँझी
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