22. ज़िन्दगी भी कट गयी, जी भी लिये, हैरत है ये
ज़िन्दगी भी कट गयी, जी भी लिये हैरत है ये
सामने आये न फिर भी आईने हैरत है ये
तर्के-ताल्लुक़ की इबारत को लिखे अरसा हुआ
ख़्वाब आते ही रहे क्यों आपके हैरत है ये
डाकिया क्यों मेरे घर पर छोड़ जाता है उन्हें
चिट्ठियाँ होती हैं जितनी बे-पते हैरत है ये
ज़िन्दगी की इक कहानी में ही जीवन कट गया
और भी क़िस्से हैं इसके अनकहे हैरत है ये
नाव में उरियाँ-बदन नाचे थे वो "माँझी" मगर
आ रही थी शर्म मुझको किसलिए हैरत है ये
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. तर्के-ताल्लुक़=सम्बन्ध-विच्छेद, 2. डाकिया=पत्र-वाहक, 3. उरियाँ-बदन=नग्न शरीर।
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