7. पूछते सब हैं यही और भी कुछ ख़ास हुआ
पूछते सब हैं यही और भी कुछ ख़ास हुआ
मैं जो हालत से मजबूर हो रक़्कास हुआ
राम तो लौट भी आए कुछ बरसों में मगर
मेरी ख़ुशियों का कभी ख़त्म न बनवास हुआ
पेट की आग बुझाने का सलीक़ा ही तो है
नाम पर उसके सही आज भी उपवास हुआ
अजनबी शख़्स रहा साये की सूरत अक्सर
आज तक उसको न इस बात का एहसास रहा
जब भी "माँझी" का चला ज़िक्र तो सबने ये कहा
नाम था उसका कभी, आज वो इतिहास हुआ
-देवेन्द्र माँझी
पेट की आग बुझाने का सलीक़ा ही तो है
नाम पर उसके सही आज भी उपवास हुआ
अजनबी शख़्स रहा साये की सूरत अक्सर
आज तक उसको न इस बात का एहसास रहा
जब भी "माँझी" का चला ज़िक्र तो सबने ये कहा
नाम था उसका कभी, आज वो इतिहास हुआ
-देवेन्द्र माँझी
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