3. ज़िन्दगी से जूझता अक्सर मिला
ज़िन्दगी से जूझता अक्सर मिला
वो कभी शीशा, कभी पत्थर मिला
मैं बड़ा हूँ , मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा
इस कलह का बीज तो घर-घर मिला
क्या वजह है राम जाने जब मिला
आईने को घूरता पत्थर मिला
धुन्ध में लिपटा हुआ था वो बदन
धूप की जो खींचता चादर मिला
आदमी की चाह में भटका है जो
आज "माँझी" का वही लश्कर मिला
देवेन्द्र मॉँझी
No comments:
Post a Comment