5. यूँ नहीं है ठाठ सुल्तानी बहुत
यूँ नहीं है ठाठ सुल्तानी बहुत
ख़ाक भी हमने यहाँ छानी बहुत
दिल दिखाये ज़ख़्म तो मैं क्या करूँ
अब तलक की इसने मनमानी बहुत
हाथ में आकर फफोलों ने कहा
आग में भी है छुपा पानी बहुत
है बुरी या है कि अच्छी क्या कहूँ
धूप रखती है कहाँ सानी बहुत
आपके होंठों पै जो अँगड़ाई ले
उस हँसी के हैं सनम मानी बहुत
काम उनका देखकर क्या नाम दूँ
जिस्म तो हाज़िर हैं इन्सानी बहुत
लहर से यूँ वास्ता "माँझी" पड़ा
याद आई बारहा नानी बहुत
देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. ठाठ सुल्तानी=राजसी ठाठ, 2. सानी=द्वितीय, दूसरा, बदल, 3. मानी=अर्थ, मतलब, 4. बारहा=बारम्बार.
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