20. चुपके-चुपके पाँव दबाए बिन आहट के आता है
चुपके-चुपके पाँव दबाए बिन आहट के आता है
मेरे दिल की टूटन को जो अपना पता बताता है
नाम नहीं बोलूँगा उसका जो मुझको भरमाता है
धूप कभी और छाँव कभी वो बनकर मुझतक आता है
टीस बहुत देगा वो मुझको इक दिन अपनी टूटन की
जो सपना-सा आँख में आकर मुझको रोज़ रिझाता है
जाने क्या करवाएगा ये मुझसे मेरा ज़िद्दीपन
दूर बहुत ही तन्हाई में मुझको लेकर जाता है
"माँझी" को आभास हुआ है जबसे दुनियादारी का
पानी की पर्तों के क़िस्से तब से रोज़ सुनाता है
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment