17. क़िस्सा साफ़ न कर पाया मैं
क़िस्सा साफ़ न कर पाया मैं
ख़ुद को माफ़ न कर पाया मैं
बिक तो जाता पर भावों का
नीचा ग्राफ़ न कर पाया मैं
मुझसे सबकी उम्मीदें थीं
पर, इन्साफ़ न कर पाया मैं
चाहत थी बस एक कँवल की
झील को साफ़ न कर पाया मैं
सब-कुछ जाता देख रहा था
फिर भी हॉफ न कर पाया मैं
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment