18. सहमे न कभी धूप की छत के भी तले हम
सहमे न कभी धूप की छत के भी तले हम
आँधी की तरह तेज़ बहुत तेज़ चले हम
सोने का हिरन ख़ाक हमें आ के लुभाता
ख़्वाबों के नहीं, सोच के साये में पले हम
दुनिया का तो नम्बर ही आया न अभी तक
अपने ही उसूलों ने हर बार छले हम
कुछ देख तो लेते हैं कुदरत के करिश्मे
इस भीड़ से तन्हाई के आलम में भले हम
इन्साफ़ इसे कैसे भला मान लें "माँझी"
इक दिन तो जलेंगे सब, हर रोज़ जले हम
-देवेन्द्र माँझी
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