15. उड़ता मैं कैसे जब मेरे पर ले गयी हवा
उड़ता मैं कैसे जब मेरे पर ले गयी हवा
धड़ को ज़मीं पे छोड़कर सर ले गयी हवा
तहरीर दिल की आँख के काग़ज़ में क़ैद थी
पलकों का पहरा तोड़ मगर ले गयी हवा
आँखें खुलीं तो हड़बड़ा के देखता रहा
जाना कहाँ था मुझको किधर ले गयी हवा
कल धूल सर पे आके बताने लगी मुझे
चुपके से मेरे घर की ख़बर ले गयी हवा
"माँझी" जो जूझता रहा मौजो-बलाओं से
बेख़ौफ़ मुझको कर दिया डर ले गयी हवा
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. पर=पंख.
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