23. कर गया था कल तो अपने ख़ून से मैं तर सभी
कर गया था कल तो अपने ख़ून से मैं तर सभी
फिर भला प्यासे हैं क्यों इस शहर के पत्थर सभी
जब भी मैं लिखता हूँ अपनी ज़िन्दगी की दास्ताँ
बौखला जाते हैं जाने किसलिए अक्षर सभी
ख़ाक इस दुनिया पे मैंने डाल दी मुद्दत हुई
पूछते हैं फिर भी क्यों मेरा पता अक्सर सभी
काँपती है रूह मेरी दोस्ती के नाम से
उसकी फ़ितरत कह रहे हैं जिस्म के नश्तर सभी
नाव "माँझी" भावनाओं की अभी डूबी नहीं
हाँ, मगर कोशिश में हैं इस लोक के सागर सभी
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. फ़ितरत=स्वभाव, आदत, धूर्तता.
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