13. राह दिखलाते रहे जो रौशनी बनकर मुझे
राह दिखलाते रहे जो रौशनी बनकर मुझे
क्यों वही छलने चले हैं तीरगी बनकर मुझे
ज़िन्दगी की बेवफ़ाई से सभी दो-चार हैं
मौत धोखा दे रही है ज़िन्दगी बनकर मुझे
जी रहे हैं वो यहाँ इन्सानियत को मारकर
हर क़दम मरना पड़ा है आदमी बनकर मुझे
मैं बनी पत्थर, गई हारी, गई बनवास भी
क्या मिला सीता, अहिल्या, द्रोपती बनकर मुझे
वो समन्दर काम उसका है लहर को लूटना
ख़ाक वो दिखलाएगा "माँझी" नदी बनकर मुझे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. तीरगी=अँधेरा, 2. दो-चार=परिचित.
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