पहले तो अपने हाथ सँवारे हवा मुझे
पहले तो अपने हाथ सँवारे हवा मुझे
ले जाके फिर ख़लाओं में मारे हवा मुझे
जंगल में जाके रोती है फिर वो भी साँयें-साँयें
बीती रुतों के साथ जो हारे हवा मुझे
मौसम बदलता देखता हूँ सबकी आँख में
काँधे से जब ज़मीं पे उतारे हवा मुझे
मअनी मैं उसकी बात का समझा न आज तक
करती है रोज़-रोज़ इशारे हवा मुझे
"माँझी" बताओ कैसे भला फिर चलेगी नाव
दिन में दिखाए रोज़ ही तारे हवा मुझे
देवेन्द्र माँझी
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