19. आपको सब लोग बस छालों का डर देते रहे
आपको सब लोग बस छालों का डर देते रहे
मैं मुसाफ़िर था सदा मुझको सफ़र देते रहे
आपकी आँखों को मैंने ख़्वाब बख़्शे थे हसीं
सोचकर क्या आप मुझको चश्मेतर देते रहे
जो जलाये थे कभी हमने तुम्हारे वास्ते
उन चराग़ों के अँधेरे हमको डर देते रहे
बात हँसने की नहीं तो और क्या है बोलिए
बिन परों वाले भी यारो हमको पर देते रहे
नाव और पतवार की "माँझी" शरारत देखिये
पानियों का ही सदा मुझको समर देते रहे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. चश्मेतर=नम आँख, 2. पर=पंख.
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