9. आग देगी मुझे जला यूँ ही
आग देगी मुझे जला यूँ ही
तुम जो देते रहे हवा यूँ ही
ज़िन्दगी की ग़ज़ल सुना यूँ ही
रोज़ ख़ुदसे फ़रेब खा यूँ ही
पास आकर पता लगा इसका
वो लगा था हमें भला यूँ ही
आप मेरे नहीं भला कैसे
कौन देता है बददुआ यूँ ही
आज "माँझी" बहुत थका-सा है
मौज तू छोड़ रास्ता यूँ ही
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. फ़रेब=धोखा, 2. मौज=लहर.
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